top of page

धार्मिक विचार मलखानसिंह भदौरिया

  • May 20, 2025
  • 3 min read

विचार – मलखान सिंह भदौरिया

(एक अंतरात्मा की पुकार)


धर्म का वास्तविक स्वरूप केवल पूजा-पाठ, मंदिरों में जाना या भव्य अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। आज हम देखते हैं कि अधिकांश लोग प्रतिदिन मंदिर जाते हैं, करोड़ों रुपये दान करते हैं, व्रत-उपवास रखते हैं और धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं, किंतु अपने आस-पास के जीवों पर दया नहीं करते, जरूरतमंदों की सहायता नहीं करते, और मानवीय संवेदनाओं से रहित होकर अपने "धार्मिक" कर्तव्यों का पालन करते हैं। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना है।


मैं यह नहीं कहता कि मंदिर में जाना या दान देना गलत है। आपकी श्रद्धा और आस्था जिस रूप में है, उसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन सच्चा दान वह है जिसे आपकी अंतरात्मा भी स्वीकार करे – और वह है जरूरतमंद की मदद, पीड़ित की पीड़ा में सहभागी बनना। यही वह पुण्य है जिसकी साक्षी खुद ईश्वर भी देते हैं।


हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम इस पृथ्वी पर अपनी मर्जी से नहीं आए, बल्कि ईश्वर की इच्छा से जन्म लिया। जिस परिवार, समाज, देश, और जिले में हमने जन्म लिया, वह ईश्वर की योजना का हिस्सा है। हमारा सबसे पहला कर्तव्य उन लोगों के प्रति बनता है, जो हमें पहले मिले – मां, फिर पिता, फिर भाई, फिर पड़ोसी, फिर पत्नी और अंत में संतान। जिस क्रम में ये संबंध हमारे जीवन में आए, उसी क्रम में उनका महत्व और सेवा भी हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।


भगवान श्रीराम का जीवन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। उन्होंने पिता और भाई के लिए महल, सुख और राज्य छोड़ दिया, और समाज के लिए अपनी पत्नी तक का त्याग कर दिया। इस त्याग में संदेश है – ईश्वर ने सिखाया कि अपने व्यक्तिगत सुख से बढ़कर पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्य होते हैं।


भजन और पूजा का वास्तविक अर्थ केवल शरीर से किए जाने वाले कर्मकांड नहीं हैं। शरीर भौतिक है, और ईश्वर का स्वरूप आत्मिक। सच्चा भजन अंतरात्मा से होता है, प्रेम से होता है, और तब होता है जब हम ईश्वर द्वारा बताए गए मार्ग पर चलें। रामचरितमानस और श्रीमद्भगवद्गीता में जो संदेश दिए गए हैं, उन्हें जीवन में उतारना ही सच्चा धर्म है।


शबरी माता की बताई “प्रथम भक्ति संतन्ह कर संग…” जैसी भक्ति की परिभाषा को समझना चाहिए। अहंकार, क्रोध, लोभ और मोह – ये विकार हैं जो हमारे पाप का संकेत देते हैं। जबकि प्रेम, त्याग, करुणा और नम्रता – ये हमारे पुण्य की पहचान हैं।


आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम अपने भीतर झांकें – क्या हम छल, कपट, दिखावे और स्वार्थ से ग्रसित हैं? यदि हां, तो हम चाहे जितनी बार पूजा करें, भगवान की कृपा प्राप्त नहीं हो सकती। श्रीराम ने स्वयं कहा – "निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।" अर्थात, निर्मल हृदय वाले को ही ईश्वर प्राप्त होते हैं।


जिस प्रकार एक बेटा अपने पिता को अच्छे वस्त्र और पकवान तो देता है, लेकिन उनकी आज्ञा का पालन नहीं करता – क्या वह सच्चा सेवक कहा जाएगा? उसी प्रकार हम ईश्वर को अगरबत्ती, फूल और प्रसाद तो चढ़ा दें लेकिन उनके बताए हुए सिद्धांतों को अपने जीवन में न उतारें – क्या वे हमसे प्रसन्न होंगे?


अतः मेरा विनम्र मानना है –


> “धर्म का अर्थ पूजा से अधिक कर्तव्य है,

भक्ति का अर्थ मंत्रों से अधिक व्यवहार है,

और ईश्वर की प्राप्ति केवल मंदिर में नहीं –

वह मिलती है अपने भीतर झांकने से,

और दूसरों के लिए कुछ त्याग कर देने से।”


- मलखान सिंह भदौरिया

(कांग्रेस नेता, सामाजिक चिंतक – भिंड, म.प्र.)


अगर आप चाहें तो मैं इस लेख को पीडीएफ या प्रिंट करने योग्य फ़ॉर्मेट में भी बना सकता हूँ।

 
 
 

Comments


bottom of page